नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने निजी मेडिकल कॉलेजों की फीस निर्धारण को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि सरकार निजी मेडिकल कॉलेजों को सरकारी कॉलेजों जैसी फीस लेने के लिए मजबूर नहीं कर सकती। कोर्ट ने कहा कि ऐसा करने से निजी संस्थानों का संचालन प्रभावित होगा और कई कॉलेज बंद होने की स्थिति में पहुंच सकते हैं, जिससे देश में डॉक्टरों की उपलब्धता पर भी असर पड़ेगा।
न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने राजस्थान के निजी मेडिकल कॉलेजों की फीस संरचना को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि जिन छात्रों के पास फीस चुकाने की क्षमता नहीं है, वे सरकारी मेडिकल कॉलेजों का विकल्प चुन सकते हैं तथा आर्थिक सहायता योजनाओं का लाभ ले सकते हैं।
मामला राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (एनएमसी) के उस निर्देश से जुड़ा था, जिसमें निजी मेडिकल कॉलेजों और डीम्ड विश्वविद्यालयों में 50 प्रतिशत सीटों की फीस सरकारी मेडिकल कॉलेजों के बराबर रखने की बात कही गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने माना कि स्ववित्तपोषित संस्थानों की अपनी आर्थिक संरचना होती है और उन पर सरकारी फीस लागू करना व्यावहारिक नहीं है।
अदालत ने यह भी कहा कि चिकित्सा शिक्षा के क्षेत्र में निजी संस्थानों का योगदान महत्वपूर्ण है और उनकी वित्तीय स्वतंत्रता को बनाए रखना आवश्यक है। इस फैसले को निजी मेडिकल शिक्षा क्षेत्र के लिए बड़ी राहत माना जा रहा है।


