Thursday, September 24, 2026
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न्यायालय ने पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण संबंधी तेलंगाना की याचिका खारिज की

नयी दिल्ली. उच्चतम न्यायालय ने तेलंगाना सरकार की उस याचिका को बृहस्पतिवार को खारिज कर दिया जिसमें स्थानीय निकायों में पिछड़े वर्गों को 42 प्रतिशत आरक्षण देने संबंधी सरकारी आदेश पर रोक लगाने के उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती दी गई थी.
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने याचिका खारिज करते हुए कहा, “आप पहले से मौजूद आरक्षण के साथ अपने चुनाव जारी रखें.” तेलंगाना की कांग्रेस नीत सरकार ने स्थानीय निकायों में पिछड़े वर्गों को 42 प्रतिशत आरक्षण प्रदान करने के लिए 26 सितंबर को सरकारी आदेश जारी किया था.

राज्य सरकार ने तेलंगाना उच्च न्यायालय के नौ अक्टूबर के आदेश को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी, जिसमें सरकारी आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी गई थी. याचिका खारिज करते हुए पीठ ने कहा कि उसके आदेश का असर उच्च न्यायालय में लंबित याचिकाओं पर नहीं पड़ेगा और इन मामलों में उनके गुण-दोष के आधार पर निर्णय लिया जाएगा. उच्च न्यायालय ने यह आदेश उन याचिकाओं पर पारित किया था जिनमें कहा गया था कि सरकारी आदेश ने स्थानीय निकायों में कुल आरक्षण को बढ.ाकर 67 प्रतिशत कर दिया है.

याचिकाकर्ताओं ने उच्च न्यायालय को बताया था कि सरकारी आदेश ने शीर्ष अदालत द्वारा अपने फैसलों में निर्धारित 50 प्रतिशत आरक्षण की सीमा का उल्लंघन किया है. उच्च न्यायालय ने सरकारी आदेश को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए राज्य को चार सप्ताह में अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया था.

बृहस्पतिवार को सुनवाई के दौरान, तेलंगाना की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक सिंघवी ने शीर्ष अदालत को बताया कि राज्य उच्च न्यायालय के अंतरिम आदेश से प्रभावित हुआ है. पीठ ने कहा, “आप चुनाव जारी रखें.” मामले में पेश हुए एक वकील ने कहा कि उच्च न्यायालय ने चुनावों पर रोक नहीं लगाई है.

सिंघवी ने दलील दी, “यह एक ऐसे राज्य का नीतिगत फैसला है जो खुद को सूचित, शिक्षित और प्रबुद्ध करना चाहता है और फिर सभी नीतियां पिछड़े वर्गों के एक बहुत बड़े प्रतिशत को ध्यान में रखकर बनाना चाहता है.” उन्होंने यह भी कहा कि बिना दलीलों के सरकारी आदेश पर रोक कैसे लगाई जा सकती है.

सिंघवी ने कहा कि अंतिम दो पृष्ठों को छोड़कर, उच्च न्यायालय ने रोक लगाने का कोई कारण नहीं बताया. पीठ ने कहा, “आपका मामला यह नहीं है कि आरक्षण नहीं है. आरक्षण है. आप आरक्षण का प्रतिशत बढ.ा रहे हैं.” सिंघवी ने कहा कि यह एक “गलत धारणा” है कि शीर्ष अदालत के पिछले फैसलों में आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत तय की गई थी. पीठ ने पूछा, “आप चुनाव की अधिसूचना की तारीख से पहले ही अपना सरकारी आदेश क्यों नहीं जारी कर सकते थे?” सिंघवी ने कहा कि राज्यपाल ने विधेयक को लंबित रखा.

सिंघवी ने पीठ से आग्रह किया कि वह इस याचिका पर विचार करे और इस “बड़े मुद्दे” पर सुनवाई करे कि क्या राज्य कभी 50 प्रतिशत की सीमा को छू सकते हैं. जब पीठ ने कहा कि उच्च न्यायालय का नौ अक्टूबर का आदेश एक अंतरिम आदेश था, तो सिंघवी ने कहा कि उसने पूरी प्रक्रिया पर रोक लगा दी है.

उच्च न्यायालय के आदेश के बाद तेलंगाना राज्य निर्वाचन आयोग ने एक बयान जारी कर कहा था कि 29 सितंबर को चुनाव अधिसूचना जारी कर दी गई है और अगली अधिसूचना तक आगे की गतिविधियों को स्थगित किया जा रहा है. राज्य निर्वाचन आयोग ने अक्टूबर और नवंबर के बीच ग्रामीण स्थानीय निकायों के चुनावों के लिए पांच चरणों का कार्यक्रम 29 सितंबर को घोषित किया था. याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वकीलों ने उच्च न्यायालय को बताया था कि यह सरकारी आदेश उच्चतम न्यायालय द्वारा कुल आरक्षण पर लगाई गई 50 प्रतिशत की ऊपरी सीमा का उल्लंघन करता है.

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