Thursday, September 24, 2026
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एयर इंडिया पायलट के पिता, फेडरेशन ने विमान दुर्घटना की न्यायिक जांच के लिए न्यायालय का किया रुख

नयी दिल्ली. एयर इंडिया के दिवंगत कैप्टन सुमित सभरवाल के पिता पुष्करराज सभरवाल और भारतीय पायलट संघ ने उच्चतम न्यायालय का रुख किया है और 12 जून को अहमदाबाद में एयर इंडिया की उड़ान संख्या एआई 171 के दुर्घटनाग्रस्त होने के मामले की जांच अदालत की निगरानी में शीर्ष अदालत के एक पूर्व न्यायाधीश की अध्यक्षता में कराने का निर्देश देने का अनुरोध किया है. इस हादसे में 260 लोग मारे गए थे .

शीर्ष अदालत ने 22 सितंबर को कहा था कि दुर्घटना पर एएआईबी की प्रारंभिक रिपोर्ट के कुछ पहलुओं से पायलटों की ओर से चूक का संकेत मिलता है, और एक स्वतंत्र, निष्पक्ष और शीघ्र जांच के अनुरोध वाली एक अन्य याचिका पर केंद्र और नागरिक उड्डयन महानिदेशक (डीजीसीए) को नोटिस जारी किया था. पुष्करराज सभरवाल (91) ने इस दुखद घटना की ‘निष्पक्ष, पारदर्शी और तकनीकी रूप से मजबूत’ जांच का अनुरोध किया है.

याचिका में कहा गया है, ”दुर्घटना के सटीक कारण की पहचान किए बिना अधूरी और पक्षपातपूर्ण जांच, भविष्य में यात्रियों के जीवन को खतरे में डाल सकती है और व्यापक रूप से विमानन सुरक्षा को कमज.ोर करती है, जिससे संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन होता है.” एपी एंड जे चैंबर्स के माध्यम से 10 अक्टूबर को दायर की गई इस याचिका में केंद्रीय नागरिक उड्डयन मंत्रालय, डीजीसीए और विमान दुर्घटना जांच बोर्ड (एएआईबी) के महानिदेशक को प्रतिवादी बनाया गया है और इस पर दिवाली की छुट्टियों के बाद सुनवाई होने की संभावना है.

याचिका में 229 यात्रियों, चालक दल के 12 सदस्यों और जमीन पर मौजूद 19 लोगों की मौत की जांच के लिए विमानन एवं तकनीकी विशेषज्ञों वाली एक स्वतंत्र समिति के गठन का निर्देश देने का अनुरोध किया गया है. इस विमान ने अहमदाबाद से लंदन गैटविक के लिए उड़ान भरी थी, लेकिन कुछ ही मिनटों में यह दुर्घटनाग्रस्त हो गया. यह विमान दुर्घटनाग्रस्त होकर रनवे से महज एक समुद्री मील दूरी पर स्थित बीजे मेडिकल कॉलेज क छात्रावास पर गिर गया था.

याचिका में कहा गया है कि आपातकालीन लोकेटर ट्रांसमीटर (ईएलटी) सक्रिय नहीं हो पाया और पायलट-इन-कमांड कैप्टन सुमीत सभरवाल और सह-पायलट कैप्टन क्लाइव कुंदर की दुर्घटना में मृत्यु हो गई. इसमें कहा गया है कि एएआईबी और डीजीसीए द्वारा की गई आधिकारिक जांच ‘त्रुटिपूर्ण, पक्षपातपूर्ण और तकनीकी रूप से मजबूत नहीं’ है. प्रारंभिक रिपोर्ट में कथित तौर पर दुर्घटना का कारण पायलट की गलती बताया गया है, जबकि कई प्रणालीगत और तकनीकी खामियों को अनदेखा किया गया है जो निर्णायक भूमिका निभा सकती थीं. यह रिपोर्ट 12 जुलाई, 2025 को जारी की गयी थी.

याचिका के अनुसार, ”जांच दल ने व्यापक तकनीकी जांच करने के बजाय, मृत पायलटों पर असंगत रूप से ध्यान केंद्रित किया है, जो अब अपना बचाव करने में असमर्थ हैं और उन्होंने विद्युत, सॉफ़्टवेयर या डिज.ाइन-स्तर की विफलताओं के विश्वसनीय सबूतों को नज.रअंदाज. कर दिया है.” इसमें कहा गया है कि इस तरह का दृष्टिकोण न केवल मृत चालक दल की प्रतिष्ठा को धूमिल करता है, बल्कि विमानन सुरक्षा को भी कमज.ोर करता है, जो संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और सम्मान के अधिकार का उल्लंघन है.

याचिका में कहा गया है, ”भारत के संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत एक उचित रिट, आदेश या निर्देश जारी करें और इस माननीय न्यायालय के एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक न्यायिक निगरानी समिति या जांच न्यायालय का गठन करें, जिसमें स्वतंत्र विमानन एवं तकनीकी विशेषज्ञ सदस्य हों, ताकि दुर्घटना की निष्पक्ष, पारदर्शी और तकनीकी रूप से मज.बूत जांच की जा सके….” याचिका में यह भी निर्देश देने का अनुरोध किया गया है कि दुर्घटना की अब तक की सभी पूर्व जांच, ”12 जुलाई की प्रारंभिक रिपोर्ट सहित, बंद मानी जायें और सभी प्रासंगिक सामग्री, डेटा एवं रिकॉर्ड न्यायिक निगरानी समिति या जांच न्यायालय को हस्तांतरित कर दिए जायें.”

दिवंगत पायलट सभरवाल के पिता ने कहा कि उनके बेटे का ”30 वर्षों से अधिक का बेदाग करियर रहा है, जिसमें 15,638 घंटे की दुर्घटना-रहित उड़ान शामिल है, जिसमें बोइंग 787-8 विमान पर 8,596 घंटे की उड़ान शामिल है और एक भी ऐसी चूक या घटना की सूचना नहीं मिली जिससे कोई मौत या अन्य कोई घटना हुई हो.” याचिका में कहा गया है कि जांच के इस तरीके के कारण बोइंग से संबंधित अन्य अधिक विश्वसनीय तकनीकी और प्रक्रियात्मक कारकों की पर्याप्त जांच नहीं हो पाई है या उन्हें खारिज भी नहीं किया जा सका है, जो इस दुखद घटना का कारण हो सकता है.”

इसमें यह भी कहा गया है, ”सम्मानपूर्वक इस बात को निवेदित किया जा रहा है कि विमान दुर्घटना की जांच के लिए प्रतिवादियों द्वारा नियुक्त पांच सदस्यीय जांच दल स्पष्ट रूप से अवैध और अमान्य है, क्योंकि यह प्राकृतिक न्याय के मूल सिद्धांत, यानी “नेमो जुडेक्स इन कॉज.ा सुआ” का उल्लंघन करता है, जिसके अनुसार किसी भी व्यक्ति को अपने मामले में न्यायाधीश नहीं होना चाहिए. इसमें कहा गया कि जांच ??दल में डीजीसीए, राज्य विमानन प्राधिकरणों के अधिकारी की प्रमुखता रही, जिनकी प्रक्रियाएं, निगरानी और संभावित खामियां सीधे तौर पर जांच से जुड़ी हैं.

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