नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और लगातार बढ़ रही महंगाई भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए नई चुनौतियां खड़ी कर सकती हैं। एक हालिया रिपोर्ट में अनुमान जताया गया है कि यदि मौजूदा परिस्थितियां बनी रहीं, तो वर्ष 2027 तक भारत की अर्थव्यवस्था पर लगभग 5 लाख करोड़ रुपये तक का अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ सकता है।
रिपोर्ट के अनुसार कच्चे तेल और गैस की कीमतों में संभावित वृद्धि से पेट्रोल-डीजल, एलपीजी, उर्वरक, रसायन, परिवहन और विनिर्माण क्षेत्रों की लागत बढ़ सकती है। इसका सीधा असर आम उपभोक्ताओं की जेब पर पड़ेगा और घरेलू मांग में कमी आने की आशंका भी बढ़ेगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि ऊर्जा कीमतों में वृद्धि का असर बाजार पर भी दिखाई दे सकता है। शेयर बाजार में उतार-चढ़ाव, निवेशकों की सतर्कता और आयात लागत बढ़ने से आर्थिक गतिविधियों की रफ्तार प्रभावित हो सकती है। हालांकि भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूत घरेलू मांग और नीतिगत सुधार कुछ हद तक इस प्रभाव को संतुलित करने में मदद कर सकते हैं।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि बढ़ती भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं के कारण रुपये पर दबाव बढ़ सकता है, जिससे आयात महंगा होगा और मुद्रास्फीति को नियंत्रित करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। सेवा क्षेत्र और निर्यात गतिविधियों पर भी इसका असर देखने को मिल सकता है।
उधर, वैश्विक स्तर पर उर्वरक और ऊर्जा कीमतों में बढ़ोतरी से सरकार पर सब्सिडी का बोझ बढ़ने की संभावना है। इससे राजकोषीय संतुलन बनाए रखना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि भारत को ऊर्जा स्रोतों के विविधीकरण, घरेलू उत्पादन बढ़ाने और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं को मजबूत करने की दिशा में निरंतर प्रयास करने होंगे।
आर्थिक जानकारों के अनुसार, यदि वैश्विक परिस्थितियों में सुधार नहीं हुआ तो महंगाई और भू-राजनीतिक तनाव आने वाले वर्षों में आर्थिक वृद्धि की गति को प्रभावित कर सकते हैं। हालांकि मजबूत घरेलू बाजार और सरकारी नीतियां भारत को इन चुनौतियों से निपटने में महत्वपूर्ण सहारा प्रदान कर सकती हैं।


