Saturday, September 26, 2026
Homeमध्य प्रदेशAI और नए कानूनों पर मंथन: ग्वालियर पहुंचे चार राज्यों के न्यायिक...

AI और नए कानूनों पर मंथन: ग्वालियर पहुंचे चार राज्यों के न्यायिक अधिकारी, जस्टिस मिश्रा ने जताई चिंता

ग्वालियर 

ग्वालियर में मध्य प्रदेश राज्य न्यायिक अकादमी की ओर से क्षेत्रीय न्यायिक सम्मेलन का शनिवार को शुभारंभ हुआ। उद्घाटन सत्र में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा ने कहा कि न्यायदान केवल कानून की धाराओं को जानने तक सीमित नहीं है। न्याय की उम्मीद लेकर अदालत पहुंचने वाले लोगों और उनकी वास्तविक परिस्थितियों को समझना भी जरूरी है। उनके अनुसार, केवल जानना अमूर्त है, जबकि समझना उस ज्ञान का वास्तविक उपयोग है।

उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया, यूट्यूब और डीपफेक तकनीक के कारण वास्तविक और कृत्रिम सामग्री के बीच अंतर करना मुश्किल हो गया है। सम्मेलन में मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र (बॉम्बे), गुजरात और राजस्थान हाईकोर्ट के न्यायाधीश, राज्य न्यायिक अकादमियों के निदेशक, रजिस्ट्री के अधिकारी और चारों राज्यों के अधीनस्थ न्यायालयों के न्यायिक अधिकारी शामिल हुए।

अनुभव से ज्यादा जरूरी नई परिस्थितियों को समझना

न्यायमूर्ति मिश्रा ने कहा कि न्यायिक शिक्षा किसी निश्चित पाठ्यक्रम या सिलेबस तक सीमित नहीं है। इसका दायरा न्यायाधीश की सोच और समझ पर निर्भर करता है। वर्षों का अनुभव यह बताता है कि अतीत में क्या देखा है, लेकिन सच्ची शिक्षा यह सिखाती है कि अब तक सामने नहीं आई परिस्थितियों से कैसे निपटना है।

उन्होंने कहा कि समाज लगातार बदल रहा है, इसलिए न्यायपालिका को भी अपने वैचारिक दायरे का विस्तार करते रहना होगा।

डीपफेक के दौर में असली-नकली साक्ष्य पहचानना चुनौती

तकनीक के बढ़ते प्रभाव का जिक्र करते हुए न्यायमूर्ति मिश्रा ने कहा कि आज अदालतों के सामने ऐसी चुनौतियां हैं, जिनका सामना अधिकांश न्यायिक अधिकारियों ने अपने करियर की शुरुआत में नहीं किया था। सोशल मीडिया, यूट्यूब और डीपफेक तकनीक के कारण वास्तविक और कृत्रिम सामग्री के बीच अंतर करना मुश्किल हो गया है।

उन्होंने कहा कि साक्ष्य कृत्रिम हो सकते हैं और उन्हें अदालत में पेश करने वाले भी तकनीक का इस्तेमाल कर सकते हैं। ऐसे में न्यायपालिका को आधुनिक डिजिटल साक्ष्यों की जटिलताओं को समझना होगा।

पुराने कानूनों की नई व्याख्या की जरूरत

न्यायमूर्ति मिश्रा ने कहा कि अपराधी जब तकनीक के इस्तेमाल में अधिक सक्षम और शातिर हो रहे हैं, तो न्यायाधीशों को भी दशकों पुराने कानूनों की व्यावहारिक और वर्तमान परिस्थितियों के अनुरूप व्याख्या तलाशनी होगी।

उन्होंने भारतीय न्यायपालिका पर भरोसा जताते हुए कहा कि देश और समाज के सामने जब भी नई चुनौतियां आई हैं, न्यायपालिका ने मजबूती से उनका सामना किया है और लोकतंत्र की रक्षा में अपनी भूमिका निभाई है।

कार्यक्रम में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के प्रशासनिक न्यायाधीश, मध्य प्रदेश राज्य न्यायिक अकादमी के निदेशक दिनेश चंद्र लाल सहित जिला एवं पुलिस प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारी और चारों राज्यों के न्यायिक अधिकारी मौजूद रहे।

इन मुद्दों पर चल रहा मंथन

  •     न्यायिक शिक्षा को बदलती कानूनी और तकनीकी जरूरतों के अनुरूप विकसित करने पर जोर।
  •     जजों को कानून के साथ सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों को समझने की जरूरत।
  •     न्यायिक प्रशिक्षण में निष्पक्षता, समानता और संवेदनशीलता को शामिल करने की बात।
  •     जजों को अपनी सीमाओं और पूर्वाग्रहों को पहचानकर लगातार सीखते रहने की जरूरत।
  •     न्यायिक शिक्षा में Ethics, Logic और Psychology को शामिल करने पर जोर।
  •     DNA रिपोर्ट, वॉयस सैंपल और डिजिटल सबूतों की समझ के लिए तकनीकी प्रशिक्षण जरूरी।
  •     डिजिटल दौर में अपराधों की जांच में इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस और डिजिटल फुटप्रिंट अहम सबूत।
  •     इलेक्ट्रॉनिक सबूत की विश्वसनीयता समझने के लिए जांच और न्यायिक अधिकारियों का विशेष प्रशिक्षण जरूरी।
  •     फॉरेंसिक लैब, पुलिस जांच और जेल व्यवस्था समझने के लिए ज्यूडिशियल अधिकारियों की फील्ड ट्रेनिंग का सुझाव।
  •     मध्य प्रदेश में तीनों नए आपराधिक कानूनों को एक डिजिटल प्लेटफॉर्म से जोड़ने की पहल का उल्लेख।
  •     Judicial Academy में पारंपरिक प्रशिक्षण से आगे 360 डिग्री और इमर्सिव लर्निंग पर जोर।
  •     ADR और Mediation को बढ़ावा देने की जरूरत।
RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Most Popular

Recent Comments