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लद्दाख हिंसा भड़काने के लिए मुझे दोषी ठहराना ‘बलि का बकरा’ बनाने की रणनीति : सोनम वांगचुक

लेह/कारगिल. जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने लद्दाख में हाल ही में हुए हिंसक विरोध प्रदर्शनों के लिए गृह मंत्रालय द्वारा उन्हें जिम्मेदार ठहराए जाने को ”बलि का बकरा” बनाने की रणनीति बताते हुए बृहस्पतिवार को कहा कि इसका उद्देश्य हिमालयी क्षेत्र की मूल समस्याओं से निपटने से बचना है. गृह मंत्रालय ने वांगचुक को उग्र हिंसा भड़काने का जिम्मेदार ठहराया है और संबंधित बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए जलवायु कार्यकर्ता ने कहा कि वह कड़े जन सुरक्षा अधिनियम (पीएसए) के तहत गिरफ्तारी के लिए तैयार हैं.

उन्होंने ‘पीटीआई-भाषा’ को फोन पर बताया, ”ये कहना कि यह (हिंसा) मेरे या कांग्रेस द्वारा भड़काई गई थी, समस्या के मूल से निपटने के बजाय बलि का बकरा ढूं­ढ़ने जैसा है, और इससे कोई हल नहीं निकलेगा.” वांगचुक ने कहा, ”वे किसी को बलि का बकरा बनाने की चालाकी कर सकते हैं, लेकिन वे बुद्धिमान नहीं हैं. इस समय, हम सभी को ‘चतुराई’ की बजाय बुद्धिमत्ता की आवश्यकता है, क्योंकि युवा पहले से ही निराश हैं.”

जलवायु कार्यकर्ता ने कहा, ”मैं देख रहा हूं कि वे कुछ ऐसा मामला बना रहे हैं, ताकि मुझे जन सुरक्षा अधिनियम के तहत गिरफ्तार करके दो साल के लिए जेल में डाल सकें. मैं इसके लिए तैयार हूं, लेकिन सोनम वांगचुक को आजाद रखने के बजाय जेल में डालने से समस्याएं और ब­ढ़ सकती हैं.” जलवायु कार्यकर्ता ने हिंसा भड़कने के लिए लंबे समय से चली आ रही शिकायतों, खासकर क्षेत्र के युवाओं में व्याप्त हताशा को जिम्मेदार ठहराया और तर्क दिया कि असली वजह ”छह साल की बेरोजगारी और हर स्तर पर अधूरे वादों की हताशा” है.

उन्होंने सरकार पर नौकरी में आरक्षण पर सफलता का दावा करके जनता को गुमराह करने का आरोप लगाया तथा कहा कि राज्य का दर्जा एवं लद्दाख के आदिवासी दर्जे और पर्यावरण की रक्षा के लिए छठी अनुसूची के विस्तार की मुख्य मांगों पर पांच साल की शांतिपूर्ण अपीलों के बाद भी गौर नहीं किया गया हैं. वांगचुक ने कहा कि ”बलि का बकरा” बनाने की रणनीति अपनाकर सरकार ”वास्तव में शांति के उपाय नहीं कर रही है,” बल्कि ऐसे कदम उठा रही है, जो लोगों की मूल मांगों से ध्यान भटकाकर स्थिति को ”और बिगाड़” देंगे.

अधिकारियों के मुताबिक, वांगचुक के नेतृत्व में लद्दाख राज्य का आंदोलन बुधवार को लेह में हिंसा, आगजनी और हिंसा में बदल गया, जिसमें चार लोगों की मौत हो गई और 40 पुलिसर्किमयों सहित कम से कम 80 लोग घायल हो गए. केंद्रीय गृह मंत्रालय ने बुधवार रात एक बयान में आरोप लगाया था कि कार्यकर्ता सोनम वांगचुक और ”राजनीति से प्रेरित” कुछ ऐसे लोग, जो सरकार और लद्दाखी समूहों के प्रतिनिधियों के बीच बातचीत में हुई प्रगति से खुश नहीं हैं, उनके ”भड़काऊ बयानों” की वजह से भीड़ हिंसक हो गई.

केडीए ने लेह हिंसा की निष्पक्ष जांच की मांग की, कार्यकर्ता सोनम वांगचुक का बचाव किया

कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस (केडीए) ने लद्दाख के लेह शहर में प्रदर्शनकारियों और सुरक्षार्किमयों के बीच हुई झड़पों की निष्पक्ष जांच की बृहस्पतिवार को मांग की और केंद्र शासित प्रदेश प्रशासन से लोगों को निशाना बनाने एवं उनका उत्पीड़न बंद करने को कहा. केडीए ने जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक का भी बचाव किया, जिन्हें सरकार ने “भड़काऊ बयान” देने के लिए दोषी ठहराया है. संगठन ने हिंसा में मारे गए चार प्रदर्शनकारियों के परिवारों के प्रति सहानुभूति व्यक्त करते हुए उन्हें ”लद्दाख के नायक” बताया.

केडीए के सह-अध्यक्ष असगर अली करबलाई ने यहां संवाददाताओं से कहा, “हालात को उचित तरीके से संभालने के बजाय प्रशासन ने निहत्थे प्रदर्शनकारियों पर अत्यधिक बल का प्रयोग किया…हम हिंसा की विस्तृत जांच चाहते हैं और गोलीबारी का आदेश देने वालों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई चाहते हैं.” ‘लेह एपेक्स बॉडी’ और केडीए पिछले चार वर्षों से लद्दाख को राज्य का दर्जा देने सहित अपनी मांगों के समर्थन में संयुक्त रूप से आंदोलन चला रहे हैं और अतीत में सरकार के साथ कई दौर की वार्ता भी कर चुके हैं.

लद्दाख के सांसद हनीफा जान और प्रमुख नेता सज्जाद कारगिली सहित केडीए के अन्य वरिष्ठ सदस्यों के साथ मौजूद करबलाई ने कहा कि जो कुछ भी हुआ वह दुर्भाग्यपूर्ण था, लेकिन सरकार ने जिस तरह से हालात को संभाला वह ह्लहमारे घावों पर नमक छिड़कनेह्व जैसा था.

उन्होंने कहा, ”केंद्रशासित प्रदेश प्रशासन और गृह मंत्रालय इन घटनाओं के लिए समान रूप से जिम्मेदार हैं. हम पिछले पांच सालों से भी ज़्यादा समय से अपनी चार मांगों के समर्थन में शांतिपूर्ण ढंग से आंदोलन कर रहे हैं, जिनमें राज्य का दर्जा, छठी अनुसूची का विस्तार, लोक सेवा आयोग और लेह व कारगिल के लिए अलग लोकसभा सीट शामिल हैं.” उन्होंने कहा, ”हम भूख हड़ताल, प्रदर्शन और मार्च कर रहे हैं, लेकिन सरकार की नाकामी ने युवाओं को मुश्किल में डाल दिया है. स्थानीय युवाओं को कोई नौकरी नहीं दी गई और बातचीत में जानबूझकर देरी करने की कोशिश की गई.” उन्होंने कहा कि 27 मई की वार्ता के बाद केंद्र सरकार ने एक महीने के भीतर अगले दौर की वार्ता का वादा किया था, लेकिन लगातार अनशन के बावजूद ”चुप्पी साधे रखी”.

करबलाई ने कहा कि वांगचुक के नेतृत्व में भूख हड़ताल 10 सितंबर से चल रही थी, लेकिन निकट भविष्य में बैठक के बजाय केंद्र ने छह अक्टूबर को वार्ता के लिए बुलाया, जबकि भूख हड़ताल के 11 दिन बीत चुके थे. उन्होंने कहा, ”दो बुजुर्ग प्रतिभागी गंभीर रूप से बीमार पड़ गए और उन्हें अस्पताल ले जाना पड़ा, जिससे लोगों में चिंता फैल गई.” उन्होंने कहा, ”वे (प्रशासन) वांगचुक और अन्य पर आरोप लगाकर खुद को बचाने की कोशिश कर रहे हैं. यह केंद्र शासित प्रदेश और गृह मंत्रालय की विफलता है.” करबलाई ने कहा कि सरकार दावा कर रही है कि उन्हें हिंसा की आशंका थी, लेकिन पहले से ज.रूरी सुरक्षा उपाय क्यों नहीं किए गए.

सांसद हनीफा जान ने कहा कि गृह मंत्रालय द्वारा अगले दौर की वार्ता आयोजित न करने के बाद लद्दाख के लोग उपेक्षित महसूस कर रहे हैं. उन्होंने कहा, ”सरकार को युवाओं का उत्पीड़न बंद करना चाहिए, स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच करनी चाहिए और लंबित मांगों को हल करने के लिए पूरी गंभीरता से बातचीत फिर से शुरू करनी चाहिए.” केडीए नेताओं ने सरकार पर ‘लेह एपेक्स बॉडी’ से जुड़े लोगों को परेशान करने तथा युवाओं को बड़े पैमाने पर हिरासत में लेने का भी आरोप लगाया.

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