Friday, September 25, 2026
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धर्मांतरण के पीड़ित अगर दूसरों का धर्म बदलने की कोशिश करते हैं तो कार्रवाई हो सकती है: अदालत

अहमदाबाद/नयी दिल्ली. गुजरात उच्च न्यायालय ने कहा है कि धर्म परिवर्तन का शिकार होने का दावा करने वाले व्यक्ति यदि बाद में दूसरों का धर्म परिवर्तन करने का प्रयास करते हैं तो उन्हें भी कानूनी कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है. न्यायमूर्ति निर्जर देसाई की अदालत ने कई व्यक्तियों द्वारा दायर याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए एक अक्टूबर को कहा,”अन्य व्यक्तियों को इस्लाम में धर्मांतरित करने के लिए प्रभावित करने, उन पर दबाव डालने और उन्हें प्रलोभन देने” के उनके कृत्य के कारण उनके खिलाफ प्रथम दृष्टया अपराध बनता है.

याचिकाकर्ताओं ने दावा किया कि वे मूल रूप से हिंदू थे और अन्य व्यक्तियों ने उनका धर्मांतरण कराकर उन्हें मुसलमान बनाया, इसलिए वे स्वयं धर्म परिवर्तन के शिकार हैं, न कि आरोपी. अदालत ने कहा कि वे (याचिकाकर्ता) ”अन्य व्यक्तियों पर इस्लाम धर्म अपनाने के लिए दबाव डालने और उन्हें लुभाने” में शामिल थे जिससे उनके विरुद्ध प्रथम दृष्टया अपराध बनता है. धर्म परिवर्तन कराने के कई आरोपियों ने उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था और तर्क दिया था कि वे स्वयं धर्मांतरण के शिकार हैं और उनके विरुद्ध दर्ज प्राथमिकी अनुचित है. उन्होंने भरूच जिले के आमोद थाने में उनके खिलाफ दर्ज प्राथमिकी को रद्द किए जाने का अनुरोध किया था.

उच्च न्यायालय ने उनकी याचिका को खारिज करते हुए कहा, ”जैसा कि प्राथमिकी और गवाहों के बयानों से नजर आता है, अन्य व्यक्तियों को इस्लाम में धर्मांतरण के लिए प्रभावित करने, दबाव डालने और लुभाने के उनके कृत्य के कारण” और आज प्रस्तुत सामग्री की समीक्षा करने पर अदालत का मानना ??है कि ”प्रथम दृष्टया अपराध बनता है.” अदालत ने भारतीय दंड संहिता की धाराओं 120 (बी) (आपराधिक षड्यंत्र), 153 (बी)(1)(सी) (विभिन्न समूहों के बीच दुश्मनी को ब­ढ़ावा देना) और 295 (ए) (धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के इरादे से जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण कार्य) के तहत आरोपी कई व्यक्तियों द्वारा दायर याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान यह आदेश दिया. एक शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि तीन लोगों ने उसके अंगूठे का निशान लेकर उसे इस्लाम धर्म में परिर्वितत कर दिया था और एक आरोपी को इन गतिविधियों को अंजाम देने के लिए वित्तीय सहायता मिल रही थी.

प्राथमिकी के अनुसार, आरोपी बनाए गए तीन लोगों ने 37 हिंदू परिवारों के लगभग 100 लोगों को धन और अन्य प्रलोभन देकर इस्लाम धर्म में परिर्वितत कराया और जब उसने (शिकायतकर्ता ने) विरोध किया, तो उसे धमकाया गया जिसके बाद उसने पुलिस से संपर्क किया. मामले में कुल 16 लोगों को आरोपी बनाया गया हैं जिनमें से नौ नामजद हैं. इन आरोपियों में से कुछ ने प्राथमिकी रद्द कराने के लिए उच्च न्यायालय का रुख किया था. धर्मांतरण गतिविधियों के लिए धन मुहैया कराने के आरोपी एक विदेशी नागरिक की एक अन्य याचिका पर सुनवाई के दौरान भी उच्च न्यायालय ने कहा कि उसके खिलाफ प्रथम दृष्टया मामला बनता है.

हिंदू संत संगठनों ने धर्मांतरण रोधी कानूनों पर रोक लगाने संबंधी याचिकाओं पर सुनवाई को लेकर सवाल उठाए

प्रमुख हिंदू संत संगठनों ने विभिन्न राज्यों द्वारा लागू धर्मांतरण रोधी कानूनों पर रोक लगाने की मांग वाली याचिकाओं पर सुनवाई करने के उच्चतम न्यायालय के तरीके पर बृहस्पतिवार को सवाल उठाए और कहा कि उसे इन याचिकाओं पर पहले उच्च न्यायालयों में सुनवाई करने देनी चाहिए थी क्योंकि मामला संबंधित राज्य सरकारों से जुड़ा है.

अखिल भारतीय संत समिति के महासचिव स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती महाराज ने यहां एक संयुक्त संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करते हुए सुनवाई के कदम की कड़ी आलोचना की और इस बात पर सार्वजनिक बहस शुरू करने के लिए एक राष्ट्रव्यापी अभियान शुरू करने की घोषणा की कि ”देश में कानून जनता के निर्वाचित प्रतिनिधि बनाएंगे या न्यायाधीश”.

उन्होंने कहा, ”संतों ने इस मुद्दे को लोगों के सामने ले जाने और इस पर सार्वजनिक बहस शुरू करने का फैसला किया है. इसका फैसला लोगों को ही करना चाहिए… इसे संवैधानिक व्यवस्था के तहत ही तय किया जाना चाहिए.” अखिल भारतीय संत समिति के महासचिव ने कहा, ”अवैध धर्म परिवर्तन कोई साधारण मुद्दा नहीं है. यह जनसांख्यिकीय बदलाव और देश की एकता व अखंडता का मामला है.” उन्होंने कहा कि मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करने के आग्रह वाली स्वामी दयानंद सरस्वती की याचिका पर शीर्ष अदालत ने कहा था कि यह राज्य सरकारों का मामला है, इसलिए इन सभी मामलों की सुनवाई उच्चतम न्यायालय में एक साथ नहीं हो सकती.
संत संगठनों की मांग से कुछ दिन पहले उच्चतम न्यायालय ने कई राज्यों से उनके धर्मांतरण रोधी कानूनों पर रोक लगाने के अनुरोध वाली याचिकाओं पर उनका रुख पूछा था. राज्यों को नोटिस जारी करते हुए प्रधान न्यायाधीश बी आर गवई और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने स्पष्ट किया कि जवाब मिलने के बाद वह ऐसे कानूनों के क्रियान्वयन पर रोक लगाने के अनुरोध पर विचार करेगी.

पीठ उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, छत्तीसग­ढ़, गुजरात, हरियाणा, झारखंड और कर्नाटक सहित कई राज्यों द्वारा लागू किए गए धर्मांतरण रोधी कानूनों की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी.
इस कदम पर सवाल उठाते हुए स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती महाराज ने कहा, ”चूंकि ये राज्य सरकारों के मामले हैं, इसलिए उच्चतम न्यायालय को इन मामलों पर तभी विचार करना चाहिए जब संबंधित उच्च न्यायालय इन पर निर्णय दे दें.” उन्होंने कहा, ”इसके अलावा, हर राज्य की परिस्थितियाँ अलग-अलग हैं, और उनके कानूनों की प्रकृति तथा उनके विरोध के आधार भी अलग-अलग हैं. इन सभी मामलों की एक साथ सुनवाई कैसे हो सकती है, यह किसी की समझ से परे है.” संवाददाता सम्मेलन में निर्मोही अनी अखाड़े के अध्यक्ष एवं अखाड़ा परिषद के महासचिव महंत राजेंद्र दास महाराज और विश्व हिंदू परिषद के संयुक्त महासचिव सुरेंद्र जैन भी मौजूद थे.

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