नयी दिल्ली. केंद्र ने बृहस्पतिवार को शॉर्ट सर्विस कमीशन की महिला अधिकारियों को स्थायी कमीशन देने पर अपनी नीति का बचाव किया और कहा कि इस पहलू पर शीर्ष अदालत के फैसले का बिना किसी भेदभाव के पालन किया जा रहा है. न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां और न्यायमूर्ति एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने सेना के 84 अधिकारियों के बैच पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया. अधिकारियों ने स्थायी कमीशन की अनुमति देने से इनकार करने को चुनौती दी है.
केंद्र और सेना की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने कहा कि 2020 में बबिता पुनिया मामले और 2021 में नितिशा मामले के फैसलों ने वास्तव में उस नीति को कायम रखा है और जो भी खामियां अदालत द्वारा बताई गई थीं, उन्हें अंतत? सुधार दिया गया. न्यायमूर्ति कांत ने भाटी से कहा कि इसका मतलब यह नहीं है कि सेना ने स्थायी कमीशन पर अपनी नीति में सुधार कर लिया है और जो भी खामियां थीं, उन्हें नितिशा फैसले के बाद दूर कर दिया गया है.
अपनी दलीलें समाप्त करते हुए, भाटी ने कहा, ह्लकोई भी प्रक्रिया सभी को संतुष्ट नहीं कर सकती और हमेशा असंतोष होता रहेगा.ह्व उन्होंने कहा कि छंटनी सेना को युवा बनाए रखने की नीति का हिस्सा थी और इसे बिना किसी भेदभाव के सभी पर समान रूप से लागू किया गया था. शॉर्ट र्सिवस कमीशन (एसएससी) अधिकारियों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी, वी. मोहना, अभिनव मुखर्जी और रेखा पल्ली ने जवाबी दलीलें दीं.
पीठ ने कहा कि वह नौसेना, वायुसेना और तटरक्षक बल द्वारा दिये जाने वाले स्थायी कमीशन से संबंधित इसी प्रकार की याचिकाओं पर भी सुनवाई करेगी. केंद्र ने पुरुष समकक्षों की तुलना में एसएससी अधिकारियों को स्थायी कमीशन देने में किसी भी तरह के भेदभाव से 24 सितंबर को इनकार करते हुए शीर्ष अदालत को आश्वासन दिया था कि सभी मापदंडों का विधिवत पालन किया जा रहा है. भाटी ने कहा कि स्थायी कमीशन प्रदान करने में सभी के लिए एक समान नीति अपनाई जाती है.
अदालत में याचिका दायर करने वाली महिला अधिकारियों की दलीलों का विरोध करते हुए भाटी ने कहा था कि उन अधिकारियों की वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट वास्तव में लैंगिक रूप से तटस्थ थी, जिसमें किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं था. उन्होंने कहा कि अपनाई गई कार्यप्रणाली सभी अधिकारियों पर समान रूप से लागू होती है.
महिला अधिकारियों ने तर्क दिया है कि दुर्गम क्षेत्रों में तैनात होने और गलवान, बालाकोट और हाल ही में हुए ऑपरेशन सिंदूर जैसे अभियानों में भाग लेने के बावजूद, उन्हें स्थायी कमीशन के लिए नहीं चुना गया. सेना में आम तौर पर शार्ट र्सिवस कमीशन के तहत अधिकारी की सेवा दस साल तक होती है, जिसे कुछ मामलों में विस्तार दिया जा सकता है.


