Thursday, September 24, 2026
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वन अधिकार अधिनियम के जरिए वनों में निवासरत लोगों के जीवन में बदलाव लाना हमारी जिम्मेदारी

रायपुर. आदिम जाति विकास विभाग के प्रमुख सचिव सोनमणी बोरा ने वन अधिकार अधिनियम के क्रियान्वयन से जुड़े मास्टर ट्रेनरों के प्रशिक्षण सत्र के शुभारंभ अवसर पर कहा कि वन अधिकार अधिनियम के जरिए वनों में निवासरत लोगों के जीवन में बदलाव लाना हमारी जिम्मेदारी है. उन्होंने कहा कि हम सब को इस अधिनियम के बेहतर क्रियान्वयन कर वन निवासियों के सामाजिक, आर्थिक उन्नति, वनों की सुरक्षा के लिए उन्हें अधिकार सम्पन्न बनाना है. जिससे वे वन अधिकार पत्रों के साथ-साथ शासन की विभिन्न योजनाओं लाभ उठा सके.

गौरतलब है कि नवा रायपुर स्थित आदिवासी अनुसंधान एवं प्रशिक्षण संस्थान में सामुदायिक वन संसाधान प्रबंधन समिति के गठन एवं कार्य योजना निर्माण पर आयोजित तीन दिवसीय मास्टर ट्रेनरों का 24 से 26 सितम्बर तक तीन दिवसीय प्रशिक्षण का आयोजन किया गया है. इस प्रशिक्षण में वन अधिकार अधिनियम के क्रियान्वयन से जुड़े अधिकारी सहित एनजीओ के प्रतिनिधि शामिल थे. इस मौक़े पर प्रभारी आयुक्त संजय गौड़, फाउंडेशन ऑफ़ इकोलॉजिकल सिक्युरिटी के राज्य समन्वय सुनमिता मिश्रा, यूएनडीपी के किशोर कुुमार सहित अन्य सभी संभाग के प्रशिक्षार्थी उपस्थित थे.

प्रशिक्षण कार्यक्रम को सम्बोधित करते हुए प्रमुख सचिव बोरा ने कहा कि वन अधिकार वनों में निवास करने वाले लोगों के लिए एक ऐसा रास्ता है, जिसके माध्यम से शिक्षा, स्वास्थ्य, आरक्षण, मनरेगा से रोजगार, पीडीएस जैसे कई योजनाओं का लाभ मिल सकता है. इन कार्यों के जरिए हम उन्हें समाज की मुख्यधारा में लाने में सहायक बन सकते हैं. हमें केवल परियोजना को क्रियान्वयन करने के उद्देश्य से नहीं, बल्कि हमें पूर्णतः रूप से लाभ दिलाने के उद्देश्य से कार्य करना चाहिए. उन्होंने कहा कि नई तकनीकों के इस्तेमाल कर शत-प्रतिशत पात्र हितग्राहियों को लाभ पहुंचाने की दिशा में कार्य करना चाहिए.

प्रमुख सचिव बोरा ने कहा कि सामुदायिक वन संसाधन अधिकार अत्यत महत्वपूर्ण है, जिसके फलस्वरुप ग्राम समाएं अपनी परंपरागत वनो की सुरक्षा संरक्षण, प्रबंधन एवं पुनर्जनन अपनी आवश्यकता तथा नीति अनुसार करने का अधिकार मिलता है. यह व्यवस्था जनजातियों तथा अन्य परंपरागत वन निवासियों के वन संसाधन पारंपरिक धरोहर तथा जैव विविधता को बचाये रखने के साथ ही वन आधारित पारपरिक आजीविका को सुदृढ़ करने में सहायक है. इसके अतिरिक्त इसी प्रकार की व्यवस्था के फलस्वरुप हम जलवायु परिवर्तन एवं पर्यावरण सरक्षण की दिशा में सफल कदम उठा सकते है.

प्रमुख सचिव बोरा ने कहा कि छत्तीसगढ़ में 13 हजार से अधिक ग्राम सभाएं हैं. जिसमें से 4 हजार 300 ग्रामों में सामुदायिक वन प्रबंधन संसाधन समिति गठन के लिए स्वीकृति दी जा चुकी है तथा 2070 ग्रामों में सामुदायिक वन प्रबंधन समिति का गठन किया जा चुका है. उन्होंने कहा कि राज्य के 13 हजार ग्राम सभा में भी सामुदायिक वन संसाधन समितियां गठन की जा सकती है इस पर कार्य करने की जरूरत है. उन्होंने सामुदायिक वन संसाधन प्रबंधन अधिनियम की चर्चा करते हुए कहा कि नार्थ इस्ट राज्य जैसे त्रिपुरा, मेघालय में आज भी जमीन सामुदायिक रूप से है. वहां मिलजुलकर कहां खेती-किसानी करते हैं, कौन सी फसल लेनी है, का निर्णय लेते हैं और बेहतर जीवन यापन की दिशा में काम कर रहे हैं. हमें सामुदायिक शक्ति को और सशक्त करने की दिशा में काम करना चाहिए.

प्रशिक्षण सत्र के दौरान बताया कि छत्तीसगढ़ विभिन्न वन अधिकारों की मान्यता के क्रियान्वयन में देश का अग्रणी राज्य है. प्रदेश में अब तक 04 लाख 79 हजार से अधिक व्यक्तिगत वन अधिकार, 49,000 से अधिक सामुदायिक वन संसाधन अधिकार एवं 4300 से अधिक सामुदायिक वन संसाधन अधिकार की मान्यता 19.78 लाख हेक्टर वन भूमि पर दी जा चुकी हैं. इसके अलावा विशेष प्रकार के कमजोर जनजातीय समूहों जैसे कमार के 22 ग्रामों एवं बैगा जनजातीय समुदाय के 19 ग्रामों पर क्रमशः जिला-धमतरी एव गौरेला पेण्ड्रा-मरवाही में पर्यावास अधिकार की मान्यता दी गई है. राज्य सरकार ने व्यक्तिगत वन अधिकार पत्र अधिकारकों के वशजों को भी अधिनियम की धारा 4(4) के अतर्गत प्रदत्त अधिकारों के क्रियान्वयन हेतु फौती नामांतरण की प्रक्रिया निर्धारित कर इसकी अधिसूचना जारी की है.

वन अधिकार मान्यता अधिनियम, 2006 की धारा 3(1) (झ) में सामुदायिक वन संसाधन के अधिकारों का प्रावधान है जिसमें ग्राम सभाओं को सशक्त करने एवं वनों के सुरक्षा, संरक्षण, प्रबंधन एवं पुनर्जनन के लिए उत्तर दायित्व सौपने की दृष्टि स यह अधिकार अत्यंत महत्वपूर्ण है. अनुसूचित क्षेत्र सहित प्रदेश के 30 जिलों में वन अधिकार अधिनियम का कियान्वयन किया जा रहा है. वन अधिकार मान्यता अधिनियम के तहत सामुदायिक वन ससाधन अधिकार में मान्यता की प्रक्रिया प्रारंभ करने का अधिकार ग्राम सभाओं को है. किंतु जिलों में मैदानी स्तर पर अधिनियम के प्रति समुचित जागरूकता के अभाव में मान्यता की प्रक्रिया में त्रुटियां परिलक्षित हुई हैं जिसमें प्रमुख रुप से ग्राम सभाओं की पारंपरिक व रुढिगत सीमा का नियमानुसार निर्धारण तथा सीमांकन शामिल है. जिन्हें दूर करने के प्रयास किए जा रह हैं.

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